मोक्षमार्ग प्रकाशक
पहला अधिकार (पीठबंध प्ररूपणा)
रचियता - पंडित प्रवर टोडरमल जी
पहला अधिकार (पीठबंध प्ररूपणा)
अथ, मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र लिखा जाता है।
[मंगलाचरण]
(दोहा)
मंगलमय मंगलकरण, वीतराग-विज्ञान।
नमौं ताहि जातैं भये, अरहंतादि महान ।।१।।
करि मंगल करिहौं महा, ग्रंथकरनको काज।
जातैं मिलै समाज सब, पावै निजपद राज।।२।।
अथ, मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र का उदय होता है। वहाँ मंगल करते हैं :-
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।
यह प्राकृतभाषामय नमस्कार मंत्र है सो महामंगलस्वरूप है। तथा इसका संस्कृत ऐसा होता है :-
नमोऽर्हद्भ्यः। नमः सिद्धेभ्यः, नमः आचार्येभ्यः, नमः उपाध्यायेभ्यः, नमो लोके सर्वसाधुभ्यः। तथा इसका अर्थ ऐसा है :- नमस्कार अरहंतोंको, नमस्कार सिद्धों को, नमस्कार आचार्योंको, नमस्कार उपाध्यायोंको, नमस्कार लोकमें समस्त साधुओंको। — इसप्रकार इसमें नमस्कार किया, इसलिये इसका नाम नमस्कारमंत्र है।
अब यहाँ जिनको नमस्कार किया उनके स्वरूप का चिन्तवन करते हैं :-
अरहंतों का स्वरूप
वहाँ प्रथम अरहंतोंके स्वरूपका विचार करते हैंः — जो गृहस्थपना त्यागकर, मुनिधर्म अंगीकार करके, निजस्वभावसाधन द्वारा चार घातिकर्मोंका क्षय करके — अनंतचतुष्टयरूप विराजमान हुए; वहाँ अनंतज्ञान द्वारा तो अपने अनंतगुण-पर्याय सहित समस्त जीवादि द्रव्योंको युगपत् विशेषपनेसे प्रत्यक्ष जानते हैं, अनंतदर्शन द्वारा उनका सामान्य अवलोकन करते हैं, अनंतवीर्य द्वारा ऐसी सामर्थ्यको धारण करते हैं, अनंतसुख द्वारा निराकुल परमानन्दका अनुभव करते हैं। पुनश्च, जो सर्वथा सर्व राग-द्वेषादि विकारभावोंसे रहित होकर शांतरसरूप परिणमित हुए हैं; तथा क्षुधा-तृषादि समस्त दोषोंसे मुक्त होकर देवाधिदेवपनेको प्राप्त हुए हैं; तथा आयुध-अंबरादिक व अंगविकारादिक जो काम-क्रोधादि निंद्यभावोंके चिह्न उनसे रहित जिनका परम औदारिक शरीर हुआ है; तथा जिनके वचनोंसे लोकमें धर्मतीर्थ प्रवर्तता है, जिसके द्वारा जीवोंका कल्याण होता है; तथा जिनके लौकिक जीवोंको प्रभुत्व माननेके कारणरूप अनेक अतिशय और नानाप्रकारके वैभवका संयुक्तपना पाया जाता है; तथा जिनका अपने हितके अर्थ गणधर – इन्द्रादिक उत्तम जीव सेवन करते हैं। — ऐसे सर्वप्रकारसे पूजने योग्य श्री अरहंतदेव हैं, उन्हें हमारा नमस्कार हो।
सिद्धोंका स्वरूप
अब, सिद्धोंका स्वरूप ध्याते हैंः — जो गृहस्थ-अवस्थाको त्यागकर, मुनिधर्मसाधन द्वारा चार घातिकर्मोंका नाश होने पर अनंतचतुष्टय स्वभाव प्रगट करके, कुछ काल पीछे चार अघातिकर्मोंके भी भस्म होने पर परम औदारिक शरीरको भी छोड़कर ऊर्ध्वगमन स्वभावसे लोकके अग्रभागमें जाकर विराजमान हुए; वहाँ जिनको समस्त परद्रव्योंका सम्बन्ध छूटनेसे मुक्त अवस्थाकी सिद्धि हुई, तथा जिनके चरम शरीरसे किंचित् न्यून पुरुषाकारवत् आत्मप्रदेशोंका आकार अवस्थित हुआ, तथा जिनके प्रतिपक्षी कर्मोंका नाश हुआ, इसलिये समस्त सम्यक्त्व-ज्ञान-दर्शनादिक आत्मिक गुण सम्पूर्णतया अपने स्वभावको प्राप्त हुए हैं, तथा जिनके नोकर्मका सम्बन्ध दूर हुआ, इसलिये समस्त अमूर्त्तत्वादिक आत्मिक धर्म प्रगट हुए हैं, तथा जिनके भावकर्मका अभाव हुआ, इसलिये निराकुल आनन्दमय शुद्धस्वभावरूप परिणमन हो रहा है; तथा जिनके ध्यान द्वारा भव्य जीवोंको स्वद्रव्य – परद्रव्यका और औपाधिकभाव– स्वभावभावोंका विज्ञान होता है, जिसके द्वारा उन सिद्धोंके समान स्वयं होनेका साधन होता है। इसलिये साधने योग्य जो अपना शुद्धस्वरूप उसे दर्शानेको प्रतिबिम्ब समान हैं तथा जो कृतकृत्य हुए हैं, इसलिये ऐसे ही अनंतकाल पर्यंत रहते हैं। — ऐसे निष्पन्न हुए सिद्धभगवानको हमारा नमस्कार हो।
आचार्य-उपाध्याय-साधुका सामान्य स्वरूप
अब, आचार्य-उपाध्याय-साधुके स्वरूप का अवलोकन करते हैं :-
जो विरागी होकर, समस्त परिग्रहका त्याग करके, शुद्धोपयोगरूप मुनिधर्म अंगीकार करके — अंतरंगमें तो उस शुद्धोपयोग द्वारा अपनेको आपरूप अनुभव करते हैं, परद्रव्यमें अहंबुद्धि धारण नहीं करते, तथा अपने ज्ञानादिक स्वभावक ो ही अपना मानते हैं, परभावोंमें ममत्व नहीं करते, तथा जो परद्रव्य व उनके स्वभाव ज्ञानमें प्रतिभाषित होते हैं उन्हें जानते तो हैं, परन्तु इष्ट-अनिष्ट मानकर उनमें राग-द्वेष नहीं करते; शरीरकी अनेक अवस्थाएँ होती हैं, बाह्य नाना निमित्त बनते हैं, परन्तु वहाँ कुछ भी सुख-दुःख नहीं मानते; तथा अपने योग्य बाह्य क्रिया जैसे बनती हैं वैसे बनती हैं, खींचकर उनको नहीं करते; तथा अपने उपयोगको बहुत नहीं भ्रमाते हैं, उदासीन होकर निश्चलवृत्तिको धारण करते हैं; तथा कदाचित् मंदरागके उदयसे शुभोपयोग भी होता है — उससे जो शुद्धोपयोगके बाह्य साधन हैं उनमें अनुराग करते हैं, परन्तु उस रागभावको हेय जानकर दूर करना चाहते हैं; तथा तीव्र कषायके उदयका अभाव होनेसे हिंसादिरूप अशुभोपयोग परिणतिका तो अस्तित्व ही नहीं रहा है; तथा ऐसी अन्तरंग (अवस्था) होने पर बाह्य दिगम्बर सौम्यमुद्राधारी हुए हैं, शरीरका सँवारना आदि विक्रियाओंसे रहित हुए हैं, वनखण्डादिमें वास करते हैं, अट्ठाईस मूलगुणोंका अखण्डित पालन करते हैं; बाईस परीषहोंको सहन करते हैं, बारह प्रकारके तपोंको आदरते हैं, कदाचित् ध्यानमुद्रा धारण करके प्रतिमावत् निश्चल होते हैं, कदाचित् अध्ययनादिक बाह्य धर्मक्रियाओंमें प्रवर्तते हैं, कदाचित् मुनिधर्मके सहकारी शरीरकी स्थितिके हेतु योग्य आहार-विहारादि क्रियाओंमें सावधान होते हैं।
ऐसे जैन मुनि हैं उन सबकी ऐसी ही अवस्था होती है।
आचार्यका स्वरूप
उनमें जो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रकी अधिकतासे प्रधान पद प्राप्त करके संघमें नायक हुए हैं; तथा जो मुख्यरूपसे तो निर्विकल्प स्वरूपाचरणमें ही मग्न है और जो कदाचित् धर्मके लोभी अन्य जीव-याचक उनको देखकर राग अंशके उदयसे करुणाबुद्धि हो तो उनको धर्मोपदेश देते हैं, जो दीक्षाग्राहक हैं उनको दीक्षा देते हैं, जो अपने दोषोंको प्रगट करते हैं, उनको प्रायश्चित्त विधिसे शुद्ध करते हैं।
ऐसे आचरण अचरानेवाले आचार्य उनको हमारा नमस्कार हो।
उपाध्यायका स्वरूप
तथा जो बहुत जैन-शास्त्रोंके ज्ञाता होकर संघमें पठन-पाठनके अधिकारी हुए हैं; तथा जो समस्त शास्त्रोंका प्रयोजनभूत अर्थ जान एकाग्र हो अपने स्वरूपको ध्याते हैं, और यदि कदाचित् कषाय अंशके उदयसे वहाँ उपयोग स्थिर न रहे तो उन शास्त्रोंको स्वयं पढ़ते हैं तथा अन्य धर्मबुद्धियोंको पढ़ाते हैं।
ऐसे समीपवर्ती भव्योंको अध्ययन करानेवाले उपाध्याय, उनको हमारा नमस्कार हो।
साधुका स्वरूप
पुनश्च, इन दो पदवी धारकोंके बिना अन्य समस्त जो मुनिपदके धारक हैं तथा जो आत्मस्वभावको साधते हैं; जैसे अपना उपयोग परद्रव्यमें इष्ट-अनिष्टपना मानकर फ ँसे नहीं व भागे नहीं वैसे उपयोगको सधाते हैं और बाह्यमें उनके साधनभूत तपश्चरणादि क्रियाओंमें प्रवर्तते हैं तथा कदाचित् भक्ति – वंदनादि कार्योंमें प्रवर्तते हैं।
ऐसे आत्मस्वभावके साधक साधु हैं, उनको हमारा नमस्कार हो।
पूज्यत्व का कारण
इस प्रकार इन अरहंतादिका स्वरूप है सो वीतराग-विज्ञानमय है। उसहीके द्वारा अरहंतादिक स्तुतियोग्य महान हुए हैं। क्योंकि जीवतत्त्वकी अपेक्षा तो सर्व ही जीव समान हैं, परन्तु रागादि विकारोंसे व ज्ञानकी हीनतासे तो जीव निन्दायोग्य होते हैं और रागादिककी हीनतासे व ज्ञानकी विशेषतासे स्तुतियोग्य होते हैं; सो अरहंत-सिद्धोंके तो सम्पूर्ण रागादिकी हीनता और ज्ञानकी विशेषता होनेसे सम्पूर्ण वीतराग-विज्ञानभाव संभव है और आचार्य, उपाध्याय तथा साधुओंको एकदेश रागादिककी हीनता और ज्ञानकी विशेषता होनेसे एकदेश वीतराग-विज्ञान संभव है। — इसलिये उन अरहंतादिकको स्तुतियोग्य महान जानना।
पुनश्च, ये जो अरहंतादिक पद हैं उनमें ऐसा जानना कि — मुख्यरूपसे तो तीर्थंकरका और गौणरूपसे सर्वकेवलीका प्राकृत भाषामें अरहंत तथा संस्कृतमें अर्हत् ऐसा नाम जानना। तथा चौदहवें गुणस्थानके अनंतर समयसे लेकर सिद्ध नाम जानना। पुनश्च, जिनको आचार्यपद हुआ हो वे संघमें रहें अथवा एकाकी आत्मध्यान करें अथवा एकाविहारी हों अथवा आचार्योंमें भी प्रधानताको प्राप्त करके गणधरपदवीके धारक हों — उन सबका नाम आचार्य कहते हैं। पुनश्च, पठन-पाठन तो अन्य मुनि भी करते हैं, परन्तु जिनको आचार्यों द्वारा दिया गया उपाध्यायपद प्राप्त हुआ हो वे आत्मध्यानादि कार्य करते हुए भी उपाध्याय ही नाम पाते हैं। तथा जो पदवीधारक नहीं हैं वे सर्व मुनि साधुसंज्ञाके धारक जानना।
यहाँ ऐसा नियम नहीं है कि — पंचाचारोंसे आचार्यपद होता है, पठन-पाठनसे उपाध्यायपद होता है, मूलगुणोंके साधनसे साधुपद होता है; क्योंकि ये क्रियाएँ तो सर्व मुनियोंके साधारण हैं, परन्तु शब्दनयसे उनका अक्षरार्थ वैसे किया जाता है। समभिरूढ़नयसे पदवीकी अपेक्षा ही आचार्यादिक नाम जानना। जिसप्रकार शब्दनयसे जो गमन करे उसे गाय कहते हैं, सो गमन तो मनुष्यादिक भी करते हैं; परन्तु समभिरूढ़नयसे पर्याय-अपेक्षा नाम है। उसही प्रकार यहाँ समझना।
यहाँ सिद्धोंसे पहले अरहंतोंको नमस्कार किया सो क्या कारण ? ऐसा संदेह उत्पन्न होता है। उसका समाधान यह हैः — नमस्कार करते हैं सो अपना प्रयोजन सधनेकी अपेक्षासे करते हैं; सो अरहंतोंसे उपदेशादिकका प्रयोजन विशेष सिद्ध होता है, इसलिये पहले नमस्कार किया है।
इसप्रकार अरहंतादिकका स्वरूप चिंतवन किया, क्योंकि स्वरूप चिंतवन करनेसे विशेष कार्यसिद्धि होती है। पुनश्च, इन अरहंतादिकको पंचपरमेष्टी कहते हैं; क्योंकि जो सर्वोत्कृष्ट इष्ट हो उसका नाम परमेष्ट है। पंच जो परमेष्ट उनका समाहार-समुदाय उसका नाम पंचपरमेष्टी जानना।
पुनश्च — ऋषभ, अजित, संभव, अभिनन्दन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चन्द्रप्रभ, पुष्पदन्त, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुन्थु, अर, मल्लि, मुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पार्श्व, वर्द्धमान नामके धारक चौबीस तीर्थंकर इस भरतक्षेत्रमें वर्तमान धर्मतीर्थके नायक हुए हैं; गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान, निर्वाण कल्याणकोंमें इन्द्रादिकों द्वारा विशेष पूज्य होकर अब सिद्धालयमें विराजमान हैं; उन्हें हमारा नमस्कार हो।
पुनश्च — सीमंधर, युगमंधर, बाहु, सुबाहु, संजातक, स्वयंप्रभ, वृषभानन, अनंतवीर्य, सूरप्रभ, विशालकीर्ति, वज्रधर, चन्द्रानन, चन्द्रबाहु, भुजंगम, ईश्वर, नेमिप्रभ, वीरसेन, महाभद्र, देवयश, अजितवीर्य नामके धारक बीस तीर्थंकर पंचमेरु सम्बन्धी विदेह क्षेत्रोंमें वर्तमानमें केवलज्ञान सहित विराजमान हैं; उन्हें हमारा नमस्कार हो।
यद्यपि परमेष्टीपदमें इनका गर्भितपना है तथापि विद्यमानकालमें इनकी विशेषता जानकर अलग नमस्कार किया है।
पुनश्च, त्रिलोकमें जो अकृत्रिम जिनबिम्ब विराजमान हैं, मध्यलोकमें विधिपूर्वक कृत्रिम जिनबिम्ब विराजमान हैं; जिनके दर्शनादिकसे एक धर्मोपदेशके बिना अन्य अपने हितकी सिद्धि जैसे तीर्थंकर – केवलीके दर्शनादिकसे होती है वैसे ही होती है; उन जिनबिम्बोंको हमारा नमस्कार हो।
पुनश्च, केवलीकी दिव्यध्वनि द्वारा दिये गये उपदेशके अनुसार गणधर द्वारा रचे गये अंग-प्रकीर्णक, उनके अनुसार अन्य आचार्यादिकों द्वारा रचे गये ग्रंथादिक — ऐसे ये सब जिनवचन हैं; स्याद्वाद चिह्न द्वारा पहिचानने योग्य हैं, न्यायमार्गसे अविरुद्ध हैं इसलिये प्रामाणिक हैं; जीवको तत्त्वज्ञानका कारण हैं, इसलिये उपकारी हैं; उन्हें हमारा नमस्कार हो।
पुनश्च — चैत्यालय, आर्यिका, उत्कृष्ट श्रावक आदि द्रव्य; तीर्थक्षेत्रादि क्षेत्र; कल्याणकाल आदि काल तथा रत्नत्रय आदि भाव; जो मेरे नमस्कार करने योग्य हैं, उन्हें नमस्कार करता हूँ, तथा जो किंचित् विनय करने योग्य हैं, उनकी यथायोग्य विनय करता हूँ।
इसप्रकार अपने इष्टोंका सन्मान करके मंगल किया है।
अब, वे अरहंतादिक इष्ट कैसे हैं सो विचार करते हैंः — जिसके द्वारा सुख उत्पन्न हो तथा दुःखका विनाश हो उस कार्यका नाम प्रयोजन है; और जिसके द्वारा उस प्रयोजनकी सिद्धि हो वही अपना इष्ट है। सो हमारे इस अवसरमें वीतराग-विशेषज्ञानका होना वही प्रयोजन है, क्योंकि उसके द्वारा निराकुल सच्चे सुखकी प्राप्ति होती है और सर्व आकुलतारूप दुःखका नाश होता है।
अरहंतादिकसे प्रयोजनसिद्धि
पुनश्च, इस प्रयोजनकी सिद्धि अरहंतादिक द्वारा होती है। किस प्रकार ? सो विचारते हैं :-
आत्माके परिणाम तीन प्रकारके हैं - संक्लेश, विशुद्ध और शुद्ध। वहाँ तीव्र कषायरूप संक्लेश है, मंद कषायरूप विशुद्ध हैं, तथा कषायरहित शुद्ध हैं। वहाँ वीतरागविशेषज्ञानरूप अपने स्वभावके घातक जो ज्ञानावरणादि घातिया कर्म हैं, उनका संक्लेश परिणामों द्वारा तो तीव्र बन्ध होता है, और विशुद्ध परिणामों द्वारा मंद-बन्ध होता है, तथा विशुद्ध परिणाम प्रबल हों तो पूर्वकालमें जो तीव्र बंध हुआ था उसको भी मंद करता है। शुद्ध परिणामों द्वारा बंध नहीं होता, केवल उनकी निर्जरा ही होती है। अरहंतादिके प्रति स्तवनादिरूप जो भाव होते हैं, वे कषायोंकी मंदता सहित ही होते हैं, इसलिये वे विशुद्ध परिणाम हैं। पुनश्च , समस्त कषाय मिटानेका साधन हैं, इसलिये शुद्ध परिणामका कारण हैं; सो ऐसे परिणामोंसे अपने घातक घातिकर्मकी हीनता होनेसे सहज ही वीतराग-विशेषज्ञान प्रगट होता है। जितने अंशोंमें वह हीन हो उतने अंशोंमें यह प्रगट होता है। इस प्रकार अरहंतादिक द्वारा अपना प्रयोजन सिद्ध होता है।
अथवा अरहंतादिके आकारका अवलोकन करना या स्वरूप विचार करना या वचन सुनना या निकटवर्ती होना या उनके अनुसार प्रवर्तन करना - इत्यादि कार्य तत्काल ही निमित्तभूत होकर रागादिकको हीन करते हैं, जीव-अजीवादिकके विशेष ज्ञानको उत्पन्न करते हैं। - इसलिये ऐसे भी अरहंतादिक द्वारा वीतराग-विशेषज्ञानरूप प्रयोजन की सिद्धि होती है।
यहाँ कोई कहे कि इनके द्वारा ऐसे प्रयोजनकी तो सिद्धि इस प्रकार होती है, परन्तु जिससे इन्द्रियजनित सुख उत्पन्न हो तथा दुःखका विनाश हो - ऐसे भी प्रयोजन की सिद्धि इनके द्वारा होती है या नहीं ? उसका समाधान जो अरहंतादिके प्रति स्तवनादिरूप विशुद्ध परिणाम होते हैं उनसे अघातिया कर्मों की साता आदि पुण्यप्रकृतियों का बन्ध होता है, और यदि वे परिणाम तीव्र हों तो पूर्वकाल में जो असाता आदि पापप्रकृतियोंका बन्ध हुआ था उन्हें भी मन्द करता है अथवा नष्ट करके पुण्यप्रकृतिरूप परिणमित करता है, और उस पुण्यका उदय होने पर स्वयमेव इन्द्रियसुखकी कारणभूत सामग्री प्राप्त होती है तथा पापका उदय दूर होने पर स्वयमेव दुःखकी कारणभूत सामग्री दूर हो जाती है। - इस प्रकार इस प्रयोजनकी भी सिद्धि उनके द्वारा होती है। अथवा जिनशासनके भक्त देवादिक हैं वे उस भक्त पुरुषको अनेक इन्द्रियसुख की कारणभूत सामग्रियोंका संयोग कराते हैं और दुःखकी कारणभूत सामग्रियोंको दूर करते हैं। - इस प्रकार भी इस प्रयोजनकी सिद्धि उन अरहंतादिक द्वारा होती है। परन्तु इस प्रयोजन से कुछ भी अपना हित नही होता; क्योंकि यह आत्मा कषायभासे बाह्य सामग्रियों में इष्टुअनिष्ट्रपना मानकर स्वयं ही सुख-दुःखकी कल्पना करता है। कषाय के बिना बाह्य सामग्री कुछ सुखदुःखकी दाता नहीं है। तथा कषाय है सो सर्व आकुलतामय है, इसलिये इन्द्रियजनित सुखकी इच्छा करना और दुःखसे डरना यह भ्रम है।
पुनश्च, इस प्रयोजनके हेतु अरहंतादिक की भक्ति करनेसे भी तीव्र कषाय होनेके कारण पाप बंध ही होता है, इसलिये अपनेको इस प्रयोजन का अर्थी होना योग्य नहीं है। | अरहंतादिक की भक्ति करनेसे ऐसे प्रयोजन तो स्वयमेव ही सिद्ध होते हैं।
इसप्रकार अरहंतादिक परम इष्ट मानने योग्य हैं।
तथा वे अरहंतादिक ही परम मंगल हैं। उनमें भक्तिभाव होनेसे परम मंगल होता है। ‘मंग’ अर्थात् सुख, उसे ‘लाति’ अर्थात् देता है; अथवा ‘मं’ अर्थात् पाप उसे, ‘गालयति’ अर्थात् गाले, दूर करे उसका नाम मंगल है । इस प्रकार उनके द्वारा पूर्वोक्त प्रकार से दोनों कार्योंकी सिद्धि होती है, इसलिये उनके परम मंगलपना संभव है।
मंगलाचरण करने का कारण
यहाँ कोई पूछे कि - प्रथम ग्रंथके आदिमें मंगल ही किया सो क्या कारण है? उसका उत्तर :- सुख से ग्रंथकी समाप्ति हो, पापके कारण कोई विध्न न हो, इसलिये यहाँ | प्रथम मंगल किया है।
यहाँ तर्क - जो अन्यमती इसप्रकार मंगल नहीं करते हैं उनके भी ग्रन्थकी समाप्ति तथा विध्नका न होना देखते हैं वहाँ क्या हेतु है? उसका समाधान :- अन्यमती जो ग्रन्थ करते हैं उनमें मोहके तीव्र उदयसे मिथ्यात्व-कषायभावोंका पोषण करनेवाले विपरीत अर्थों को धरते (रखते) हैं, इसलिये उनकी निर्विध्न समाप्ति तो ऐसे मंगल किये बिना ही हो। यदि ऐसे मंगलोंसे मोह मंद हो जाये तो वैसा विपरीत कार्य कैसे बने ? तथा हम भी ग्रंथ करते हैं उसमें मोहकी मंदताके कारण वीतराग तत्त्वज्ञानका पोषण करनेवाले अर्थोको धरेंगे (रखेंगे); उसकी निर्विध्न समाप्ति ऐसे मंगल करनेसे ही हो। यदि ऐसे मंगल न करें तो मोह की तीव्रता रहे, तब ऐसा उत्तम कार्य कैसे बने ?
पुनश्च, वह कहता है कि - ऐसे तो मानेंगे; परन्तु कोई ऐसा मंगल नहीं करता उसके भी सुख दिखाई देता है, पापका उदय नहीं दिखाई देता और कोई ऐसा मंगल करता है उसके भी सुख नहीं दिखाई देता, पापका उदय दिखाई देता है - इसलिये पूर्वोक्त मंगलपना कैसे बने ? उससे कहते हैं :-
जीवोंके संक्लेश-विशुद्ध परिणाम अनेक जातिके हैं। उनके द्वारा अनेक कालोंमें पहले बँधे हुए कर्म एक काल में उदय आते हैं। इसलिये जिसप्रकार जिसके पूर्वमें बहुत धनका संचय हो उसके बिना कमाए भी धन दिखायी देता है और ऋण दिखायी नहीं देता, तथा जिसके पूर्वमें ऋण बहुतहो उसके धन कमाने पर भी ऋण दिखायी देता है धन दिखायी नहीं देता; परन्तु विचार करनेसे कमाना तो धनहीका कारण है, ऋणका कारण नहीं है। उसी प्रकार जिसके पूर्व में बहुत पुण्य का बंध हुआ हो उसके यहाँ ऐसा मंगल किये बिना भी सुख दिखायी देता है, पापका उदय दिखायी नहीं देता। और जिसके पूर्वमें बहुत पापबंध हुआ हो उसके यहाँ ऐसा मंगल करने पर भी सुख दिखायी नहीं देता, पाप का उदय दिखायी देता है, परन्तु विचार करनेसे ऐसा मंगल तो सुखहीका कारण है, पाप उदयका कारण नहीं है। - इस प्रकार पूर्वोक्त मंगलका मंगलपना बनता है।
पुनश्च , वह कहता है कि - यह भी माना; परन्तु जिनशासनके भक्त देवादिक हैं। उन्होनें उस मंगल करनेवालेकी सहायता नहीं की और मंगल न करनेवालेको दण्ड नहीं दिया सो क्या कारण ? उसका समाधान :- जीवों को सुख-दुःख होनेका प्रबल कारण अपना कर्मका उदय है, उसहीके अनुसार बाह्य निमित्त बनते हैं, इसलिये जिसके पापका उदय हो उसको सहायका निमित्त नहीं बनता और जिसके पुण्यका उदय हो उसको दण्डका निमित्त नहीं बनता।।
यह निमित्त कैसे नहीं बनता सो कहते हैं :- जो देवादिक हैं वे क्षयोपशमज्ञानसे | सबको युगपत् नहीं जान सकते । इसलिये मंगल करनेवाले और नहीं करनेवाले का जानपना किसी देवादिकको किसी कालमें होता है। इसलिये यदि उनका जानपना न हो तो कैसे सहाय करें अथवा दण्ड दें ? और जानपनाहो, तब स्वयंको जो अतिमंदकषायहो तो सहाय करनेके या दण्ड देनेके परिणाम ही नहीं होते, तथा तीव्रकषाय हो तो धर्मानुराग नहीं। हो सकता, तथा मध्यमकषायरूप वह कार्य करनेके परिणाम हुए और अपनी शक्ति न हो तो। क्या करें ? - इस प्रकार सहाय करनेका या दण्ड देने का निमित्त नहीं बनता ।।
यदि अपनी शक्ति हो और अपनेको धर्मानुरागरूप मध्यमकषाय का उदय होनेसे वैसे ही परिणाम हों, तथा उस समय अन्य जीवका धर्म-अधर्मरूप कर्त्तव्य जानें, तब कोई देवादिक किसी धर्मात्मा की सहाय करते हैं अथवा किसी अधर्मीको दण्ड देते हैं। - इस प्रकार कार्य होनेका कुछ नियम तो है नहीं - ऐसे समाधान किया ।।
यहाँ इतना जानना कि सुख होनेकी, दु:ख न होनेकी, सहाय कराने की, दुःख दिलाने की जो इच्छा है सो कषायमय है; तत्काल तथा आगामी कालमें दुःखदायक है। इसलिये ऐसी इच्छा को छोड़कर हमने तो एक वीतराग-विषेशज्ञान होने के अर्थी होकर अरहंतादिकको नमस्कारादिरूप मंगल किया है।
ग्रंथकी प्रामाणिकता और आगम-परम्परा
इस प्रकार मंगलाचरण करके अब सार्थक “ मोक्षमार्गप्रकाशक" नामक ग्रंथका उद्योत करते हैं। वहाँ, “यह ग्रंथ प्रमाण है’ - ऐसी प्रतीति कराने के हेतु पूर्व अनुसारका स्वरूप निरूपण करते हैं :-
अकारादि अक्षर हैं वे अनादि-निधन हैं, किसीके किये हुए नहीं है। इनका आकार | लिखना तो अपनी इच्छा के अनुसार अनेक प्रकार है, परन्तु जो अक्षर बोलनेमें आते हैं वे तो सर्वत्र सर्वदा ऐसे प्रवर्तते हैं । इसलिये कहा है कि - ‘सिद्धो वर्णसमाम्नायः।’ इसका अर्थ यह है कि - जो अक्षरोंका सम्प्रदाय है सो स्वयंसिद्ध है, तथा उन अक्षरोंसे उत्पन्न
सत्यार्थ प्रकाशक पद उनके समूहका नाम श्रुत है, सो भी अनादि-निधन है। जैसे - ‘जीव’ ऐसा अनादि निधन पद है सो जीवको बतलाने वाला है। इस प्रकार अपने-अपने | सत्य अर्थके प्रकाशक अनेक पद उनका जो समुदाय सो श्रुत जानना। पुनश्च , जिसप्रकार मोती तो स्वयंसिद्ध है, उनमेंसे कोई थोड़े मोतियोंको, कोई बहुत मोतियोंको, कोई किसी
प्रकार, कोई किसी प्रकार गूंथकर गहना बनाते हैं; उसी प्रकार पद तो स्वयंसिद्ध हैं, उनमें | से कोई थोड़े पदोंको, कोई बहुत पदोंको, कोई किसी प्रकार, कोई किसी प्रकार गूंथकर | ग्रंथ बनाते हैं। यहाँ मैं भी उन सत्यार्थपदोंको मेरी बुद्धि अनुसार गॅथकर ग्रंथ बनाता हूँ; मेरी मतिसे कल्पित झूठे अर्थके सूचक पद इसमें नहीं गूंथता हूँ। इसलिये यह ग्रंथ प्रमाण जानना।
प्रश्न :- उन पदों की परम्परा इस ग्रंथपर्यन्त किस प्रकार प्रवर्तमान है ?
समाधान :- अनादिसे तीर्थंकर केवली होते आये हैं, उनको सर्वका ज्ञान होता है; इसलिये उन पदोंका तथा उनके अर्थोंका भी ज्ञान होता है। पुनश्च , उन तीर्थंकर केवलियों का दिव्यध्वनि द्वारा ऐसा उपदेश होता है जिससे अन्य जीवोंको पदोंका एवं अर्थीका ज्ञान होता है, उसके अनुसार गणधरदेव अंगप्रकीर्णरूप ग्रंथ गूंथते हैं तथा उनके अनुसार अन्यअन्य आचार्यादिक नानाप्रकार ग्रंथादिककी रचना करते हैं। उनका कोई अभ्यास करते हैं, कोई उनको कहते हैं, कोई सुनते हैं। इस प्रकार परम्परामार्ग चला आता है।
अब इस भरतक्षेत्रमें वर्तमान अवसर्पिणी काल है। उसमें चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें श्री वर्धमान नामक अंतिम तीर्थंकरदेव हुए। उन्होंने केवलज्ञान विराजमान होकर जीवोंको दिव्यध्वनि द्वारा उपदेश दिया। उसको सुननेका निमित्त पाकर गौतम नामक गणधरने अगम्य अर्थोको भी जानकर धर्मानुरागवश अंगप्रकीर्णकोंकी रचना की। फिर वर्धमानस्वामी तो मुक्त हुए। वहाँ पीछे इस पंचमकालमें तीन केवली हुए - (१) गौतम, (२) सुधर्माचार्य और (३) जम्बूस्वामी । तत्पश्चात् कालदोषसे केवलज्ञानी होने का तो अभाव हुआ, परन्तु कुछ काल तक द्वादशांगके पाठी श्रुतकेवली रहे और फिर उनका भी अभाव हुआ। फिर कुछ काल तक थोड़े अंगों के पाठी रहे फिर पीछे उनका भी अभाव हुआ। तब आचार्यादिकों द्वारा उनके अनुसार बनाए गये ग्रंथ तथा अनुसारी ग्रंथोंके अनुसार बनाए गये ग्रंथ उनकी ही प्रवृत्ति रही। उनमें भी कालदोषसे दुष्टों द्वारा कितने ही ग्रंथोंकी व्युच्छित्ति हुई तथा महान ग्रंथोंका अभ्यासादि न होनेसे व्युच्छित्ति हुई। तथा कितने ही महान ग्रंथ पाये जाते हैं, उनका बुद्धिकी मन्दताके कारण अभ्यास होता नहीं। जैसे कि - दक्षिणमें गोम्मटस्वामीके निकट मूड़बिद्री नगरमें धवल, महाधवल, जयधवल पाये जाते हैं परन्तु दर्शनमात्र ही हैं। तथा कितने ही ग्रंथ अपनी बुद्धि द्वारा अभ्यास करने योग्य पाये जाते हैं, उनमें भी कुछ ग्रंथों का ही अभ्यास बनता है। ऐसे इस निकृष्ट कालमें उत्कृष्ट जैनमतका घटना तो हुआ, परन्तु इस परम्परा द्वारा अब भी जैन शास्त्रों में सत्य अर्थ का प्रकाशन करने वाले पदोंका सद्भाव प्रवर्तमान है। ग्रंथ अपनी बुद्धि द्वारा निकृष्ट कालमें उत्कृष्ट जनशन करने वाले पदों | ... [to be continued]
अपनी बात
हमने इस कालमें यहाँ अब मनुष्यपर्याय प्राप्त की। इसमें हमारे पूर्वसंस्कारसे व भले | होनहारसे जैनशास्त्रोंके अभ्यास करने का उद्यम हुआ जिससे व्याकरण, न्याय, गणित आदि | उपयोगी ग्रंथोंका किंचित् अभ्यास करके टीकासहित समयसार, पंचास्तिकाय, प्रवचनसार, नियमसार, गोम्मटसार, लब्धिसार, त्रिलोकसार, तत्वार्थसूत्र इत्यादि शास्त्र और क्षपणासार, पुरुषार्थसिद्धयुपाय, अष्टपाहुड, आत्मानुशासन आदि शास्त्र और श्रावक-मुनिके आचारके प्ररूपक अनेक शास्त्र और सुष्टुकथासहित पुराणादि शास्त्र - इत्यादि अनेक शास्त्र हैं, उनमें हमारे बुद्धि अनुसार अभ्यास वर्तता है; उससे हमें भी किंचित् सत्यार्थपदोंका ज्ञान हुआ है।
पुनश्च, इस निकृष्ट समयमें हम जैसे मंदबुद्धियों से भी हीन बुद्धिके धनी बहुत जन दिखायी देते हैं। उन्हें उन पदोंका अर्थज्ञान हो, इस हेतु धर्मानुरागवश देशभाषामय ग्रंथ | रचनेकी हमें इच्छा हुई है, इसलिये हम यह ग्रंथ बना रहें है। इसमें भी अर्थसहित उन्हीं | पदोंका प्रकाशन होता है। इतना तो विशेष है कि - जिस प्रकार प्राकृत-संस्कृत शास्त्रों में प्राकृत-संस्कृत पद लिखे जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ अपभ्रंशसहित अथवा यथार्थतासहित देशभाषारूप पद लिखते हैं; परन्तु अर्थमें व्यभिचार कुछ नहीं है।
कृत-संस्कृत पद लि। इतना तो विशेष यूथ बना रहे है। इसमवश देश
इस प्रकार इस ग्रंथपर्यन्त उन सत्यार्थपदों की परम्परा प्रवर्तती है।
असत्यपद रचना प्रतिषेध
यहाँ कोई पूछता है कि - परम्परा तो हमने इस प्रकार जानी; परन्तु इस परम्परा में सत्यार्थपदोंकी ही रचना होती आयी, असत्यार्थपद नहीं मिले, - ऐसी प्रतीति हमें कैसे हो ? उसका समाधान :- असत्यार्थपदों की रचना अति तीव्र कषाय हुए बिना नहीं बनती; क्योंकि | जिस असत्यरचना से परम्परा अनेक जीवों का महा बुरा हो और स्वयं को ऐसी महाहिंसा
के फलरूप नरक-निगोदमें गमन करना पड़े - ऐसा महाविपरीत कार्य तो क्रोध, मान, माया, लोभ अत्यन्त तीव्र होने पर ही होता है; किन्तु जैन धर्म में तो ऐसा कषायवान होता नहीं है।
प्रथम मूल उपदेशदाता तो तीर्थंकर केवली, सो तो सर्वथा मोह के नाश से सर्वकषायोंसे रहित ही हैं। फिर ग्रंथकर्ता गणधर तथा आचार्य, वे मोहके मंद उदयसे सर्व बाह्याभ्यंतर परिग्रहको त्यागकर महामंदकषायी हुए हैं; उनके उस मंदकषायके कारण किंचित् शुभोपयोग ही की प्रवृत्ति पायी जाती है और कुछ प्रयोजन ही नहीं है। तथा श्रद्धानी गृहस्थ भी कोई ग्रंथ बनाते हैं वे भी तीव्रकषायी नहीं होते। यदि उनके तीव्र कषाय हो तो सर्व कषायोंका जिस-तिस प्रकारसे नाश करनेवाला जो जिनधर्म उसमें रुचि कैसे होती ? अथवा जो कोई मोहके उदयसे अन्य कार्यों द्वारा कषायका पोषण करता है तो करो; परन्तु जिनआज्ञा भंग करके अपनी कषायका पोषण करे तो जैनीपना नहीं रहता।
इस प्रकार जिनधर्ममें ऐसा तीव्रकषायी कोई नहीं होता जो असत्य पदों की रचना | करके परका और अपना पर्याय-पर्यायमें बुरा करे ।।
प्रश्न :- यदि कोई जैनाभास तीव्रकषायी होकर असत्यार्थ पदोंको जैन-शास्त्रों में मिलाये और फिर उसकी परम्परा चलती रहे तो क्या किया जाय ?
समाधान :- जैसे कोई सच्चे मोतियोंके गहनेमें झूठे मोती मिला दे, परन्तु झलक नहीं मिलती; इसलिये परीक्षा करके पारखी ठगाता भी नहीं है, कोई भोला हो वही मोती के नाम से ठगा जाता है; तथा उसकी परम्परा भी नहीं चलती, शीघ्र ही कोई झूठे मोतियों का निषेध करता है। उसी प्रकार कोई सत्यार्थ पदों के समूहरूप जैनशास्त्र में असत्यार्थ पद मिलाये; परन्तु जैन शास्त्रोंके पदोंमें तो कषाय मिटानेका तथा लौकिक कार्य घटाने का प्रयोजन है, और उस पापी ने जो असत्यार्थ पद मिलाये हैं, उनमें कषाय का पोषण करनेका तथा लौकिक-कार्य साधनेका प्रयोजन है, इस प्रकार प्रयोजन नहीं मिलता; इसलिये परीक्षा करके ज्ञानी ठगाता भी नहीं, कोई मूर्ख हो वही जैन शास्त्रके नाम से ठगा जाता है, तथा उसकी परम्परा भी नहीं चलती, शीघ्र ही कोई उन असत्यार्थ पदों का निषेध करता है ।
दूसरी बात यह है कि - ऐसे तीव्रकषायी जैनाभास यहाँ इस निकृष्ट कालमें ही होते हैं; उत्कृष्ट क्षेत्र-काल बहुत हैं, उनमें तो ऐसे होते नहीं। इसलिये जैन शास्त्रों में असत्यार्थ | पदों की परम्परा नहीं चलती। - ऐसा निश्चय करना ।
पुनश्च, वह कहे कि - कषायोंसे तो असत्यार्थ पद न मिलाये, परन्तु ग्रंथ करनेवालों को क्षयोपशम ज्ञान है, इसलिये कोई अन्यथा अर्थ भासित हो उससे असत्यार्थ पद मिलाये, | उसकी तो परम्परा चले ?
समाधान :- मूल ग्रंथकर्ता तो गणधरदेव हैं, वे स्वयं चार ज्ञान के धारक हैं और साक्षात् केवलीका दिव्यध्वनि- उपदेश सुनते हैं, उसके अतिशयसे सत्यार्थ ही भासित होता है और उसहीके अनुसार ग्रंथ बनाते हैं; इसलिये उन ग्रंथों में तो असत्यार्थ पद कैसे गुँथे जायें ? तथा जो अन्य आचार्यादिक ग्रंथ बनाते हैं, वे भी यथायोग्य सम्यग्ज्ञानके धारक हैं। और वे मूल ग्रंथों की परम्परासे ग्रंथ बनाते हैं। दूसरी बात यह है कि - जिन पदोंका स्वयं को ज्ञान न हो उनकी तो वे रचना करते नहीं, और जिन पदों का ज्ञान हो उन्हें सम्यग्ज्ञान प्रमाणसे ठीक गूंथते हैं। इसलिये प्रथम तो ऐसी सावधानीमें असत्यार्थ पद गुँथे जाते नहीं, और कदाचित् स्वयं को पूर्व ग्रंथों के पदों का अर्थ अन्यथा ही भासित हो, तथा अपनी प्रमाणता में भी उसी प्रकार आ जाये तो उसका कुछ सारा (वश) नहीं है; परन्तु ऐसा किसी को ही भासित होता है सब ही को तो नहीं, इसलिये जिन्हें सत्यार्थ भासित हुआ हो वे उसका निषेध करके परम्परा नहीं चलने देते।
पुनश्च, इतना जानना कि - जिनको अन्यथा जाननेसे जीवका बुरा हो ऐसे देवगुरु-धर्मादिक तथा जीव-अजीवादिक तत्त्वोंको तो श्रद्धानी जैनी अन्यथा जानते ही नहीं; इनका तो जैनशास्त्रों में प्रसिद्ध कथन है। और जिनको भ्रमसे अन्यथा जानने पर भी जिनआज्ञा मानने से जीवका बुरा न हो, ऐसे कोई सूक्ष्म अर्थ हैं; उनमें से किसी को कोई अन्यथा प्रमाणतामें लाये तो भी उसका विशेष दोष नहीं है।
वही गोम्मटसार में कहा है :-
सम्माइट्ठी जीवो उवइट्ठ पवयणं तु सद्दहदि । सहदि असल्भावं अजाणमाणो गुरुणियोगा ।। (गाथा २७ जीवकाण्ड)
अर्थ :- सम्यग्दृष्टि जीव उपदेशित सत्य वचनका श्रद्धान करता है और अजानमान | गुरुके नियोगसे असत्यका भी श्रद्धान करता है - ऐसा कहा है।
पुनश्च, हमें भी विशेष ज्ञान नहीं है और जिन आज्ञा भंग करनेका बहुत भय है, परन्तु इसी विचारके बलसे ग्रंथ करने का साहस करते हैं। इसलिये इस ग्रंथ में जैसा पूर्व ग्रंथों में वर्णन है वैसा ही वर्णन करेंगे। अथवा कहीं पूर्व ग्रंथों में सामान्य गूढ वर्णन था, उसका विशेष प्रगट करके वर्णन यहाँ करेंगे। सो इसप्रकार वर्णन करने में मैं तो बहुत सावधानी रखेंगा। सावधानी करने पर भी कहीं सूक्ष्म अर्थका अन्यथा वर्णन हो | जाये तो विशेष बुद्धिमान हों, वे उसे सँवार कर शुद्ध करें - ऐसी मेरी प्रार्थना है।
इसप्रकार शास्त्र करने का निश्चय किया है।
अब यहाँ, कैसे शास्त्र वांचने - सुनने योग्य हैं तथा उन शास्त्रों के वक्ता-श्रोता | कैसे होने चाहिये उसका वर्णन करते हैं।
वाँचने-सुनने योग्य शास्त्र
जो शास्त्र मोक्षमार्गका प्रकाश करें वही शास्त्र वांचने-सुनने योग्य हैं; क्योंकि जीव संसार में नाना दुःखों से पीड़ित है। यदि शास्त्ररूपी दीपक द्वारा मोक्षमार्गको प्राप्त कर लें तो उस मार्ग में स्वयं गमन कर उन दुःखों से मुक्त हों। सो मोक्षमार्ग एक वीतराग भाव। | है; इसलिये जिनशास्त्रों में किसी प्रकार राग-द्वेष-मोहभावोंका निषेध करके वीतराग भाव | का प्रयोजन प्रगट किया हो उन्हीं शास्त्रों का वॉचना-सुनना उचित है। तथा जिन शास्त्रों में श्रृंगार-भोग-कुतूहलादिकका पोषण करके रागभावका; हिंसा-युद्धादिकका पोषण करके द्वेषभावका; और अतत्त्वश्रद्धानका पोषण करके मोहभाव का प्रयोजन प्रगट किया हो वे शास्त्र नहीं शस्त्र हैं; क्यों कि जिन राग-द्वेष-मोह भावों से जीव अनादि से दुःखी हुआ उनकी वासना जीव को बिना सिखलाये ही थी और इन शास्त्रों द्वारा उन्हीं का पोषण किया, भला होने की क्या शिक्षा दी ? जीव का स्वभाव घात ही किया। इसलिये ऐसे शास्त्रों का वाचना-सुनना उचित नहीं है।
यहाँ वाचना –सुनना जिस प्रकार कहा; उस प्रकार जोड़ना, सीखना, सिखाना, | विचारना , लिखाना आदि कार्य भी उपलक्षण से जान लेना।
इसप्रकार जो साक्षात् अथवा परम्परा से वीतरागभाव का पोषण करे - ऐसे शास्त्र | ही का अभ्यास करने योग्य है।
वक्ता का स्वरूप
अब इनके वक्ता का स्वरूप कहते हैं :- प्रथम तो वक्ता कैसा होना चाहिये कि जो | जैन श्रद्धान में दृढ़ हो; क्योंकि यदि स्वयं अश्रद्धानी हो तो औरों को श्रद्धानी कैसे करे ?
श्रोता तो स्वयं ही से हीनबुद्धि के धारक हैं, उन्हें किसी युक्ति द्वारा श्रद्धानी कैसे करे ? और श्रद्धान ही सर्व धर्मका मूल है। पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसे विद्याभ्यास करने से शास्त्र वाचने योग्य बुद्धि प्रगट हुई हो; क्योंकि ऐसी शक्ति के बिना वक्तापने का अधिकारी
कैसे हो ? पुनश्च , वक्ता कैसा होना चाहिये कि जो सम्यग्ज्ञान द्वारा सर्व प्रकार के व्यवहार| निश्चयादिरूप व्याख्यानका अभिप्राय पहिचानता हो; क्योंकि यदि ऐसा ।
न हो तो कहीं अन्य प्रयोजनसहित व्याख्यान हो उसका अन्य प्रयोजन प्रगट करके विपरीत प्रवृत्ति कराये। पुनश्च , वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसे जिनआज्ञा भंग करनेका भय बहुत हो; क्योंकि ऐसा नहीं हो तो कोई अभिप्राय विचार कर सूत्रविरूद्ध उपदेश देकर जीवोंका बुरा करे। सो ही कहा है :-
बहु गुणविज्जाणिलयो असुत्तभासी तहावि मुत्तव्यो। जह वरमणिजुत्तो वि हु विग्घयो विसहरो लोए ।।
अर्थ :- जो अनेक क्षमादिक गुण तथा व्याकरणादि विद्या का स्थान है, तथापि उत्सूत्रभाषी है तो छोड़नेयोग्य ही है जैसे कि - उत्कृष्ट मणिसंयुक्त होने पर भी सर्प है सो लोकमें विध्न ही का करनेवाला है।
पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसको शास्त्र वाचकर आजीविका आदि लौकिक-कार्य साधने की इच्छा न हो; क्योंकि यदि आशावान हो तो यथार्थ उपदेश नहीं दे सकता, उसे तो कुछ श्रोताओं के अभिप्राय के अनुसार व्याख्यान करके अपना प्रयोजन साधने का ही साधन रहे। तथा श्रोताओं से वक्ता का पद उच्च है; परन्तु यदि वक्ता लोभी हो तो वक्ता स्वयं हीन हो जाये और श्रोता उच्च हो ।
पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसके तीव्र क्रोध-मान नहीं हो; क्योंकि तीव्र क्रोधी-मानी की निन्दा होगी, श्रोता उससे डरते रहेंगे, तब उससे अपना हित कैसे करेंगे ? पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जो स्वयं ही नाना प्रश्न उठाकर स्वयं ही उत्तर दे; अथवा अन्य जीव अनेक प्रकार से बहुत बार प्रश्न करें तो मिष्ट वचन द्वारा जिस प्रकार उनका संदेह दूर हो उसी प्रकार समाधान करे । यदि स्वयं में उत्तर देने की सामर्थ्य न हो तो ऐसा कहे कि इसका मुझे ज्ञान नहीं है; क्योंकि यदि ऐसा न हो तो श्रोताओंका संदेह दूर नहीं होगा, तब कल्याण कैसे होगा? और जिनमत की प्रभावना भी नहीं हो सकती ।
पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसके अनीतिरूप लोकनिंद्य कार्योंकी प्रवृत्ति न हो; क्योंकि लोकनिंद्य कार्यों से वह हास्य का स्थान हो जाये, तब उसका वचन कौन प्रमाण करे ? वह जिन धर्म को लजाये । पुनश्च, वक्ता कैसा होना चाहिये कि जिसका कुल हीन न हो, अंग हीन न हो, स्वर भंग न हो, मिष्ट्र वचन हो, प्रभुत्व हो; जिससे लोक में मान्य हो - क्योंकि यदि ऐसा न हो तो उसे वक्तापने की महंतता शोभे नहीं- ऐसा वक्ता हो । वक्ता में ये गुण तो आवश्य चाहिये ।
ऐसा ही आत्मानुशासन में कहा है :-
प्राज्ञः प्राप्तसमस्तशास्रहृदयः प्रव्यक्तलोकस्थितः, प्रास्ताशः प्रतिभापरः प्रशमवान् प्रागेव दृष्टोत्तरः । प्रायः प्रश्नसहः प्रभुः परमनोहारी पानिन्दया, ब्रूयाद्धर्मकथां गणी गुणनिधिः प्रस्पष्टमिष्टाक्षरः ।। ५ ।।
अर्थ :- जो बुद्धिमान हो, जिसने समस्त शास्त्रों का रहस्य प्राप्त किया हो, लोक मर्यादा जिसके प्रगट हुई हो, आशा जिसके अस्त हो गई हो, कातिमान हो, उपशमी हो, प्रश्न करने से पहले ही जिसने उत्तर देखा हो, बाहुल्यतासे प्रश्नों को सहनेवाला हो, प्रभ हो, परकी तथा पर के द्वारा अपनी निन्दारहितपने से पके मन को हरने वाला हो, गुणनिधान हो, स्पष्ट मिष्ट जिसके वचन हों - ऐसा सभा का नायक धर्मकथा कहे ।।
पुनश्च, वक्ता का विशेष लक्षण ऐसा है कि यदि उसके व्याकरण-न्यायादिक तथा बडे-बडे जैन शास्त्रों का विशेष ज्ञान हो तो विशेष रूप से उसको वक्तापना शोभित हो । पुनश्च, ऐसा भी हो; परन्तु अध्यात्मरस द्वारा यथार्थ अपने स्वरूप का अनुभव जिसको न हुआ हो वह जिन धर्मका मर्म नहीं जानता, पद्धतिहीसे वक्ता होता है । अध्यात्मरसमय सच्चे जिन धर्मका स्वरूप उसके द्वारा कैसे प्रगट किया जाये ? इसलिये आत्मज्ञानी हो तो सच्चा वक्तापना होता है, क्योंकि प्रवचनसार में ऐसा कहा है कि - आगमज्ञान, तत्त्वार्थ-श्रद्धान, संयमभाव - यह तीनों आत्मज्ञान से शून्य कार्यकारी नहीं हैं ।
पुनश्च , दोहापाहुड़ में ऐसा कहा है :-
पंडिय पंडिय पंडिय कण छोडि वि तुस कंडिया । पय अत्थं तुट्ठोसि परमत्थ ण जाणइ मूढोसि ।।
अर्थ :- हे पांडे ! हे पांडे !! हे पांडे !!! तू कण को छोड़ कर तुस (भूसी) ही कूट रहा है; तू अर्थ और शब्द में सन्तुष्ट है, परमार्थ नहीं जानता; इसलिये मूर्ख ही है - ऐसा कहा है ।।
तथा चौदह विद्याओं में भी पहले अध्यात्मविद्या प्रधान कही है । इसलिये जो अध्यात्मरसका रसिया वक्ता है, उसे जिन धर्मके रहस्यका वक्ता जानना । पुनश्च , जो बुद्धि ऋद्धि के धारक हैं तथा अवधि, मनःपर्यय, केवलज्ञानके धनी वक्ता हैं; उन्हें महान वक्ता जानना । - ऐसे वक्ताओं के विशेष गुण जानना ।
सो इन विशेष गुणोंके धारी वक्ता का संयोग मिले तो बहुत भला है ही, और न मिले तो श्रद्धानादिक गुणों के धारी वक्ताओं के मुख से ही शास्त्र सुनना । इस प्रकार के गुणों के धारक मुनि अथवा श्रावक उनके मुख से तो शास्त्र सुनना योग्य है, और पद्धति बुद्धि से अथवा शास्त्र सुननेके लोभ से श्रद्धानादिगुणरहित पापी पुरुषों के मुख से शास्त्र सुनना उचित नहीं है । कहा है कि :-
तं जिणआणपरेण य धम्मो सोयव्व सुगुरुपासम्मि । अह उचिओ सद्धाओ तस्सुवएसस्स कहगाओ ।।
अर्थ :- जो जिन आज्ञा मानने में सावधान है उसे निर्ग्रन्थ सुगुरु ही के निकट धर्म सुनना योग्य है, अथवा उन सुगुरु ही के उपदेश को कहने वाला उचित श्रद्धानी श्रावक उससे धर्म सुनना योग्य है ।।
ऐसा जो वक्ता धर्मबुद्धि से उपदेशदाता हो वही अपना तथा अन्य जीवों का भला करे । और जो कषायबुद्धि से उपदेश देता है वह अपना तथा अन्य जीवों का बुरा करता है। - ऐसा जानना ।
इस प्रकार वक्ता का स्वरूप कहा ।।
श्रोता का स्वरूप
अब श्रोता का स्वरूप कहते हैं :- भली होनहार है इसलिये जिस जीवको ऐसा विचार आता है कि मैं कौन हूँ? मेरा क्या स्वरूप है ? यह चारित्र कैसे बन रहा है ? ये मेरे भाव होते हैं उनका क्या फल लगेगा? जीव दुःखी हो रहा है सो दुःख दूर होने का क्या उपाय है? –मुझको इतनी बातोंका निर्णय करके कुछ मेरा हितहो सो करना - ऐसे विचार से उद्यमवन्त हुआ है । पुनश्च , इस कार्य की सिद्धि शास्त्र सुननेसे होती है ऐसा जानकर अति प्रीतिपूर्वक शास्त्र सुनता है; कुछ पूछनाहो सो पूछता है; तथा गुरुओं के कहे अर्थ को अपने अन्तरङ्ग में बारम्बार विचारता है और अपने विचार से सत्य अर्थों का निश्चय करके जो कर्तव्य हो उसका उद्यमी होता है-ऐसा तो नवीन श्रोताका स्वरूप जानना।
पुनश्च , जो जैनधर्म के गाढ़ श्रद्धानी हैं तथा नाना शास्त्र सुनने से जिनकी बुद्धि निर्मल हुई है तथा व्यवहार-निश्चयादिका स्वरूप भलीभाँति जानकर जिस अर्थ को सुनते हैं, उसे यथावत् निश्चय जानकर अवधारण करते हैं; तथा जब प्रश्न उठता है तब अति विनयवान होकर प्रश्न करते हैं अथवा परस्पर अनेक प्रश्नोत्तर कर वस्तु का निर्णय करते हैं; शास्त्राभ्यास में अति आसक्त हैं; धर्मबुद्धि से निंद्य कार्यों के त्यागी हुए हैं - ऐसे उन शास्त्रों के श्रोता होना चाहिए ।
श्रोताओं के विशेष लक्षण ऐसे हैं - यदि उसे कुछ व्याकरण-न्यायादिक का तथा बड़े जैन शास्त्रों का ज्ञान हो तो श्रोतापना विशेष शोभा देता है । तथा ऐसा भी श्रोता हो, किन्तु उसे आत्मज्ञान न हुआ हो तो उपदेश का मर्म नहीं समझ सके; इसलिये जो
आत्मज्ञान द्वारा स्वरूप का आस्वादि हुआ है, वह जिन धर्म के रहस्य का श्रोता है। तथा | जो अतिशयवन्त बुद्धि से अथवा अवधि-मन:पर्यय से संयुक्त हो तो उसे महान श्रोता जानना
ऐसे श्रोताओं के विशेष गुण हैं । ऐसे जिन शास्त्रों के श्रोता होना चाहिये ।
पुनश्च, शास्त्र सुनने से हमारा भला होगा - ऐसी बुद्धि से जो शास्त्र सुनते हैं, परन्तु ज्ञान की मंदता से विशेष समझ नहीं पाते उनको पुण्य बन्ध होता है; विशेष कार्य सिद्ध नहीं होता । तथा जो कुल प्रवृत्ति से अथवा पद्धति बुद्धि से अथवा सहज योग बनने से शास्त्र सुनते हैं, अथवा सुनते तो हैं परन्तु कुछ अवधारण नहीं करते ; उनके परिणाम अनुसार कदाचित् पुण्यबन्ध होता है, कदाचित् पापबन्ध होता है । तथा जो मद-मत्सर भाव से शास्त्र सुनते हैं अथवा तर्क करने का ही जिनका अभिप्राय है, तथा जो महंतता के हेतु अथवा किसी लोभादिक प्रयोजन के हेतु से शास्त्र सुनते हैं, तथा जो शास्त्र तो सुनते हैं। | परन्तु सुहाता नहीं है - ऐसे श्रोताओं को केवल पापबन्ध ही होता है ।
ऐसा श्रोताओं का स्वरूप जानना । इसी प्रकार यथासंभव सीखना, सिखाना आदि जिनके पाया जाये उनका भी स्वरूप जानना ।।
इस प्रकार शास्त्र का तथा वक्ता-श्रोता का स्वरूप कहा । सो उचित शास्त्र को | उचित वक्ता होकर वाँचना, उचित श्रोता होकर सुनना योग्य है ।।
मोक्षमार्गप्रकाशक ग्रन्थ की सार्थकता
अब, यह मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र रचते हैं उसकी सार्थकता दिखाते हैं :-
इस संसार अटवी में समस्त जीव हैं वे कर्म निमित्त से उत्पन्न जो नाना प्रकार के दुःख उनसे पीड़ित हो रहे हैं; तथा वहाँ मिथ्या-अंधकार व्याप्त हो रहा है, उस कारण वहाँ से मुक्त होने का मार्ग नहीं पाते, तड़प-तड़प कर वहाँ ही दुःख को सहते हैं ।
ऐसे जीवों का भला होने के कारणभूत तीर्थंकर केवली भगवानरूपी सूर्य का उदय हुआ; उनकी दिव्यध्वनिरूपी किरणों द्वारा वहाँ से मुक्त होने का मार्ग प्रकाशित किया । जिस प्रकार सूर्य को ऐसी इच्छा नहीं है कि मैं मार्ग का प्रकाशन करूं, परन्तु सहज ही उसकी किरणें फैलती हैं, उनके द्वारा मार्ग का प्रकाशन होता है; उसी प्रकार केवली वीतराग हैं, इसलिये उनके ऐसी इच्छा नहीं है कि हम मोक्षमार्ग प्रगट करें, परन्तु सहज ही वैसे ही अघातिकर्मों के उदय से उनका शरीररूपपुद्गल दिव्यध्वनिरूप परिणमित होता है, उसके द्वारा मोक्षमार्गका प्रकाशन होता है ।
पुनश्च, गणधरदेवों को यह विचार आया कि जब केवलीसूर्य का अस्तपना होगा तब जीव मोक्षमार्गको कैसे प्राप्त करेंगे? और मोक्षमार्ग प्राप्त किये बिना जीव दुःख सहेंगे; ऐसी करुणा बुद्धिसे अंगप्रकीर्णकादिरूप ग्रन्थ वे ही हुए महान् दीपक उनका उद्योत किया।
पुनश्च , जिस प्रकार दीपक से दीपक जलाने से दीपकों की परम्परा प्रवर्तती है उसी प्रकार किन्हीं आचार्यादिकों ने उन ग्रन्थों से अन्य ग्रन्थ बनाये और फिर उन पर से किन्हीं ने अन्य ग्रन्थ बनाये । इस प्रकार ग्रन्थ होने से ग्रन्थों की परम्परा प्रवर्तती है । मैं भी पूर्व ग्रन्थों से यह ग्रन्थ बनाता हूँ ।।
पुनश्च , जिस प्रकार सूर्य तथा सर्व दीपक हैं वे मार्ग को एकरूप ही प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार दिव्यध्वनि तथा सर्व ग्रन्थ हैं वे मोक्षमार्ग को एकरूप ही प्रकाशित करते हैं; सो यह भी ग्रन्थ मोक्षमार्ग को प्रकाशित करता है । तथा जिस प्रकार प्रकाशित करने पर भी जो नेत्र रहित अथवा नेत्र विकार सहित पुरुष हैं उनको मार्ग नहीं सूझता, तो दीपक के तो मार्गप्रकाशकपने का अभाव हुआ नहीं है; उसी प्रकार प्रगट करने पर भी जो मनज्ञान रहित है अथवा मिथ्यात्वादि विकार सहित हैं उन्हें मोक्षमार्ग नहीं सूझता, तो ग्रन्थ के तो। मोक्षमार्गप्रकाशकपने का अभाव हुआ नहीं है ।
इस प्रकार इस ग्रन्थ का मोक्षमार्ग प्रकाशक ऐसा नाम सार्थक जानना ।
प्रश्न :- मोक्षमार्ग के प्रकाशक ग्रन्थ पहले तो थे ही, तुम नवीन ग्रन्थ किसलिये बनाते हो ?
समाधान :- जिस प्रकार बड़े दीपकों का तो उद्योत बहुत तेलादिक के साधन से रहता है, जिनके बहुत तेलादिक की शक्ति न हो उनको छोटा दीपक जला दें तो वे उसका साधन रख कर उसके उद्योत से अपना कार्य करें; उसी प्रकार बड़े ग्रन्थों का तो प्रकाश बहुत ज्ञानादिक के साधन से रहता है, जिनके बहुत ज्ञानादिक की शक्ति नहीं है उनको छोटा ग्रन्थ बना दें तो वे उसका साधन रखकर उसके प्रकाश से अपना कार्य करें; इसलिये यह छोटा सुगम ग्रन्थ बनाते हैं ।
पुनश्च , यहाँ जो मैं यह ग्रन्थ बनाता हूँ सो कषायों से अपना मान बढ़ाने के लिये अथवा लोभ साधने के लिये अथवा यश प्राप्त करने के लिये अथवा अपनी पद्धति रखने के लिये नहीं बनाता हूँ । जिनको व्याकरण-न्यायादिका, नय-प्रमाणादिक का तथा विशेष अर्थों का ज्ञान नहीं है उनके इस कारण बड़े ग्रन्थों का अभ्यास तो बन नहीं सकता; तथा किन्हीं छोटे ग्रन्थों का अभ्यास बने तो भी यथार्थ अर्थ भासित नहीं होता। इस प्रकार इस समय में मंदज्ञानवान् जीव बहुत दिखाई देते हैं, उनका भला होने के हेतु धर्मबुद्धि से यह भाषामय ग्रन्थ बनाता हूँ ।
पुनश्च , जिस प्रकार बड़े दरिद्री को अवलोकनमात्र चिन्तामणि की प्राप्ति हो और वह | अवलोकन न करे, तथा जैसे कोढ़ी को अमृत-पान कराये और वह न करे; उसी प्रकार संसार पीड़ित जीव को सुगम मोक्षमार्ग के उपदेश का निमित्त बने और वह अभ्यास न करे तो उसके अभाग्य की महिमा हमसे तो नहीं हो सकती । उसकी होनहार ही का विचार करने पर अपने को समता आती है । कहा है कि :-
साहीणे गुरुजोगे जे ण सुणंतीह धम्मवयणाइ । ते धिट्ठदुट्ठचित्ता अह सुहडा भवभयविहुणा ।।
स्वाधीन उपदेशदाता गुरु का योग मिलने पर भी जो जीव धर्मवचनों को नहीं सुनते वे धीठ हैं और उनका दुष्ट चित्त है । अथवा जिस संसार भय से तीर्थंकरादि डरे उस संसारभय से रहित हैं वे बड़े सुभट हैं ।
पुनश्च , प्रवचनसार में भी मोक्षमार्ग का अधिकार किया है, वहाँ प्रथम आगमज्ञान ही उपादेय कहा है । सो इस जीव का तो मुख्य कर्तव्य आगमज्ञान है । उसके होने से तत्त्वों का श्रद्धान होता है, तत्त्वों का श्रद्धान होने से संयम भाव होता है, और उस आगम से आत्मज्ञान की भी प्राप्ति होती है; तब सहज ही मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
पुनश्च, धर्म के अनेक अङ्ग हैं उनमें एक ध्यान बिना उससे ऊँचा और धर्म का अंग नहीं है; इसलिये जिस-तिस प्रकार आगम-अभ्यास करना योग्य है ।।
पुनश्च, इस ग्रन्थका तो वाँचना, सुनना, विचारना बहुत सुगम है - कोई व्याकरणादिक का भी साधन नहीं चाहिये; इसलिये अवश्य इसके अभ्यास में प्रवर्ती । तुम्हारा कल्याण होगा ।
-इति मोक्षमार्गप्रकाशक नामक शास्त्र में पीठबन्ध प्ररूपक प्रथम अधिकार समाप्त हुआ ।।१।।
Telegram
share
brightness_low